गिरते है शाख से फूल भी, गुलाव दिखने बाले,
मरते हैं अक्सर गरीबी मे ही, गरीबों पर किताब लिखने बाले,
के बेबशी चाह कर भी मुकद्दर नहीं बदल सकती,
और बदलते भी है लोग, तो ख्वावों का भी हिसाब रखने वाले,
गुनाहों का ऐसा सिलसिला है, के थामे नहीं थमता,
हमें ही वेबफा कहने लगे, चाँद तारों का खिताब रखने
वाले,
अरे अब तो सरम खाओ, खुदा के वास्ते,
इंसानियत के कत्ल को, जेहाद
कहने वाले,
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3 comments:
बहुत सुन्दर और भावुक अभिव्यक्ति ---
जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाऐं ----
aagrah hai mere blog main sammlit hon
धन्यबाद
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