बरश-बरश के हमको न यूं
भिगोया करो,
ऐ बादलों ये भी समझो, न
चुपके रोया करो,
गुजरती शाम है, आवारा
पतंगो का चलन,
चराग लौ मे, न
पतंगो को यूं जलाया करो,
चकोर हो तो,
माहताब की चाहत मे रहो,
न रातभर यूं तुम, चाँदनी
बुलाया करो,
गुलाब बागों मे रहकर, अगर
महफूज रहे,
ए गुलेबाँ न गुलाबो मे, कांटे
उगाया करो,

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