Sunday, August 24, 2014

चकोर हो तो






बरश-बरश के हमको न यूं भिगोया करो,

ऐ बादलों ये भी समझो, न चुपके रोया करो,



गुजरती शाम है, आवारा पतंगो का चलन,

चराग लौ मे, न पतंगो को यूं जलाया करो,



चकोर हो तो, माहताब की चाहत मे रहो,

न रातभर यूं तुम, चाँदनी बुलाया करो,



गुलाब बागों मे रहकर, अगर महफूज रहे,

ए गुलेबाँ न गुलाबो मे, कांटे उगाया करो,

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