क्यूँ ढहती है हर मंजिल ,
क्यूँ रेत ही बाकी रहती है ,
जलते दीपक की अग्नि की ,
क्यूँ राख ही बाकी रहती है ,
हर पंख बुना है सपनों से ,
हर धागा है अरमानो का
पर मेरी ही किस्मत में क्यूँ ,
हर शीसा है बिखरा-बिखरा ,
जब नीव बनाने जाता हु ,
हर पत्थर हूँ चुन कर रखता ,
अपने ही हाथों से मैं ,
हर परदे को हूँ सींता ,
रंगों की बगिया से चुनकर ,
हर गुल को दीवारों पर रंगता ,
पर क्यूँ हर सुबहा को मैं ,
टूटी दीवारों पर हँसता ,
मेरी कसती को लहरों की,
आदत तो थी ,
मेरे नाविक को तूफानों की,
आहट तो थी ,
पर टूटी नैय्या की,
हर एक लकड़ी ,
जब हवा मेरे काबू में थी ,
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