Saturday, August 2, 2014

मंहगाई









मंहगाई की मार पड़े तो कमर टूटने लगती है,
जब सब्जी के भाओ सुने तो जेब टूटने लगती है,

जब बीवी कहती है के कुछ राशन पानी ले आओ,
मैं डर कर चल देता हूँ, के जैसे मैया मरने लगती है,

तेल किराशन का भी अब तो इतना महगा हो गया है,
जब जलने डिबिया लगती है, तो शांशे रुकने लगती है,

पहन लघोटी काम चलालों, जब जौकी फटने लग जाए,
जब कपड़े के भाओ सुनो, पतलून सरकने लगती है,

तनखा भी जब तन ढकने की पुरजोर कोशीशे करती है,
जब त्योहारों की मार पड़े तनखा तन खाने लगती है,

खर्चे इतने है की अब तो सरकारें भी महगी बनती है,
और महगाई के कारण ही सरकारें गिरने लगती है,

टूटे खपरैलों की कुटिया गरीब की, जर्जर हालत मे होती है,
उस पर जब बारिश पड़ती है, तो कलम टूटने लगती है,

लिख कर भी क्या होगा, अनपढ़ नेता समझेगे क्या,
आत्मदाह की खेती को, जब फसलें मरने लगती है,

दम घुट जाता है यूंही बच्चों के भूखे रहने से, 
रस्सी का फंदा क्या मरेगा जब भूख मारने लगती है,

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