Thursday, August 7, 2014

कविता

मेरी कविता अनहद का कोई, सत्य मात्र नहीं है,
अनुभूति का श्रोत नहीं, न विचिलित मन कोई है,

ये तड़प उठी है की, कोई मन शांत यहाँ नहीं क्यूँ ,
हर ओर अंधेरे के बादल , और राह नहीं कोई क्यूँ,

मानव का जन्म शिद्दा क्यूँ , जग की येही नीति है,
हर ओर चला चल फैली है, क्या यही सही रीति है,

जग रचना का ये भेद नहीं, जो खुश है वो जीवन है,
जीते मर मर कर भी हैं, क्या ये जीवन जीवित है,

प्रश्न चिन्ह है सरिता की, मनभावन लहरों पर भी,
क्या जल  मगन है बहने में , या भय है रुकने में भी,

सायद कोई आ कर समझेगा, घोर दुखों को जीवन के,
जब चूल्हो मे राख़ न हो, सीने मे लड़ने की सांस न हो ,

रात वर्ष सी सिहर उठी हो, घोर दुखो के जीवन सी,
घोर दुखो के जीवन सी,     घोर दुखो के जीवन सी,   



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