Wednesday, August 6, 2014

न आफ़ताव, न चाँद का खिताब दिया

न आफ़ताव का न चाँद का,  खिताब दिया,
उनको अपनों में, हमे गैर में शुमार किया,

बड़ी फुरशत से रकीवों पे, वफ़ा करते हैं,
मेरे दामन को, जफाओं से तार-तार किया,

ये आम है के हवाओं का रुख बदलता है,
न सवे हाल न दिल को, शम्मे चराग किया,

उनको माकूल  मोहब्बत का,  भरम होता है,
न दिल अता ही किया और न, एतबार किया,

इतने नाज़ुक हैं ये आंशू,  के गिर ही जाते हैं,
न प्यार हद से किया और न, बेशुमार किया,

किस्सा उल्फ़त का ख़तम करने, फ़ासलों मे चले,
न अलविदा,  ही किया, और न इख्तियार किया,


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