न आफ़ताव का न चाँद का, खिताब दिया,
उनको अपनों में, हमे
गैर में शुमार किया,
बड़ी
फुरशत से रकीवों पे,
वफ़ा करते हैं,
मेरे
दामन को, जफाओं से तार-तार किया,
ये
आम है के, हवाओं का रुख बदलता है,
न
सवे हाल न दिल को, शम्मे चराग किया,
उनको
माकूल मोहब्बत का, भरम होता है,
न
दिल अता ही किया और न, एतबार किया,
इतने
नाज़ुक हैं ये आंशू, के गिर ही जाते हैं,
न
प्यार हद से किया और न, बेशुमार किया,
किस्सा
उल्फ़त का ख़तम करने, फ़ासलों मे चले,
न
अलविदा, ही किया, और न इख्तियार किया,
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