Sunday, August 24, 2014

मेरे गाँव की वो बस्ती

मेरे  गाँव  की  वो  बस्ती, 
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही   जैसे  सहरों  की  भीड़,  
दिल  पर  कोई  घाव  है ,
है  याद  मुझे  वो  बचपन, 
नंगे  पैरों  की  बो  तड़पन,
वो  दिन  भर  भागना, 
सैतानी  करना  भी,  
तो  एक  राज   है, 
मेरे  घर  के  चबूतरे   पे, 
सुबहा  का  मंजर  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  शाम  को, 
 बुजुर्गो  की  भीड़,  
चबूतरे  पे  याद  है , 
नीम  के  पेंड  और  साबन के,  
झूले  याद  है ,
वो  पैग  बढाकर  आसमानों   को, 
 छुने की  चाहत  याद  है ,
है  याद  मुझे  सब  फिर  भी, 
पर  क्यूँ  मैं  वो  सब  भूल  गया ,
वैसे  ही  जैसे  हर  शख्श, 
प्यार  दिलों  से  भूल   गया ,
बारिश  के  आते  ही, 
 हम  सभी  घरों  में  मिलते  थे ,
सारी  दुनिया  की  बाते,  
और  प्यार  सभी  से  करते  थे ,
और  वो  रिमझिम  सावन,  
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  लोगो  के  आंसुओं  का,  
पानी  में  धुल  जाना  याद  है ,
जब  बारात  कोई,  
मेरे  गाँव  में  आती  थी ,
सारी  बस्ती  की  खुशियाँ,  
जैसे  दूनी  हो  जाती  थी ,
सारी-सारी रातों  में  ढोलक का,  
बजना मुझे  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे घर  से,  
बेटी  का  मइके  से,  
बिदा  हो  जाना  याद  है ,
है  याद  मुझे  दादी  की,  
बढती झुर्रियां , 
और  साथ  ही  उनके,  
प्यार  का  बढ जाना  याद  है ,
ठीक  वैसे  ही  जैसे, 
लोगो  के  दिलों  में,  
पड़ती  खाई  मुझे  याद  है ,
अब  नहीं  रही  है,  
मेरे  गाँव  में  बस्ती , 
पर  मुझे  सहरों में,  
भीड़  का  बढना  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  मेरे  गाँव  में, 
पक्की  ईटो  का,  
लगना  मुझे  याद  है ,
बन  गए  है  सभी  घर  पक्के , 
अब  चोर  नहीं  कोई,  
घुसता  है  मेरे  गाँव  में ,
वैसे  ही  जैसे किसी,  
खुसी  पर  लोगों  का  मेला,  
अब  नहीं  लगता  है  मेरे  गाँव  में ,
मेरे  गाँव  की  वो  बस्ती, 
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही   जैसे  सहरों  की  भीड़,  
दिल  पर  कोई  घाव है.


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