मेरे गाँव की वो बस्ती,
आज भी मुझे याद है ,
वैसे ही जैसे सहरों की भीड़,
दिल पर कोई घाव है ,
है याद मुझे वो बचपन,
नंगे पैरों की बो तड़पन,
वो दिन भर भागना,
सैतानी करना भी,
तो एक राज है,
तो एक राज है,
मेरे घर के चबूतरे पे,
सुबहा का मंजर याद है ,
वैसे ही जैसे शाम को,
बुजुर्गो की भीड़,
चबूतरे पे याद है ,
चबूतरे पे याद है ,
नीम के पेंड और साबन के,
झूले याद है ,
झूले याद है ,
वो पैग बढाकर आसमानों को,
छुने की चाहत याद है ,
है याद मुझे सब फिर भी,
पर क्यूँ मैं वो सब भूल गया ,
वैसे ही जैसे हर शख्श,
प्यार दिलों से भूल गया ,
बारिश के आते ही,
हम सभी घरों में मिलते थे ,
सारी दुनिया की बाते,
और प्यार सभी से करते थे ,
और वो रिमझिम सावन,
आज भी मुझे याद है ,
वैसे ही जैसे लोगो के आंसुओं का,
पानी में धुल जाना याद है ,
जब बारात कोई,
मेरे गाँव में आती थी ,
मेरे गाँव में आती थी ,
सारी बस्ती की खुशियाँ,
जैसे दूनी हो जाती थी ,
सारी-सारी रातों में ढोलक का,
बजना मुझे याद है ,
वैसे ही जैसे घर से,
बेटी का मइके से,
बेटी का मइके से,
बिदा हो जाना याद है ,
है याद मुझे दादी की,
बढती झुर्रियां ,
बढती झुर्रियां ,
और साथ ही उनके,
प्यार का बढ जाना याद है ,
प्यार का बढ जाना याद है ,
ठीक वैसे ही जैसे,
लोगो के दिलों में,
लोगो के दिलों में,
पड़ती खाई मुझे याद है ,
अब नहीं रही है,
मेरे गाँव में बस्ती ,
मेरे गाँव में बस्ती ,
पर मुझे सहरों में,
भीड़ का बढना याद है ,
भीड़ का बढना याद है ,
वैसे ही जैसे मेरे गाँव में,
पक्की ईटो का,
लगना मुझे याद है ,
लगना मुझे याद है ,
बन गए है सभी घर पक्के ,
अब चोर नहीं कोई,
घुसता है मेरे गाँव में ,
घुसता है मेरे गाँव में ,
वैसे ही जैसे किसी,
खुसी पर लोगों का मेला,
खुसी पर लोगों का मेला,
अब नहीं लगता है मेरे गाँव में ,
मेरे गाँव की वो बस्ती,
आज भी मुझे याद है ,
आज भी मुझे याद है ,
वैसे ही जैसे सहरों की भीड़,
दिल पर कोई घाव है.
दिल पर कोई घाव है.
if you like the poem, please left a comment !

No comments:
Post a Comment