बंद कमरे में, सिसकना तेरी तनहाई में,
गैर है अपना,
बिछड़ना तेरी रुशवाइ में,
बो सरेआम जो खाते थे, वफ़ा की कसमें,
हम तो बैठे है अभी भी, उसी पुरवाई
में,
जब भी दावों के,
हुनर की कभी बातें होंगी,
तेरा भी जिक्र तभी आएगा,
मेरी दुहाई में,
जब भी राहों से कभी मेरे तू,
रुखसत होगी,
तेरे जाने का सितम लिख दूंगा,
मैं खुदाई में,
अब तो आंशू भी कुछ-इस कदर से,
बहते है मेरे,
भीगता जिस्मो-जिगर तेरी ही,
अगवाई में,
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