न ज़िंदगी ही दी मुझे,
न मुझे मरने दिया,
चुपचाप सींता रहा,
जो जख्म उसने दिया,
है गम नहीं मुझको,
मगर ये जनता हूँ मैं,
न जुस्तज़ू न इल्तजा,
कुछ और देकर वो गया,
थी जानती मेरी नज़र,
पर जुवां खामोश थी,
न अश्क ही वो दे सका,
न दर्द ही देकर गया,
ना मुड़ सकूँ मैं फिर,
ये वादा लेकर वो गया,
बर्बाद होकर भी मुझे,
आबाद करके वो गया,
इन हवाओं से भी यही,
फरियाद करके वो गया,
खामोश होकर भी मुझे,
आवाज़ देकर वो गया,
ने शोर देकर वो गया,
तन्हाइयों से था गिला,
मरके भी ज़िंदा हो गया,
ऐसा हुनर वो दे गया,
अफसोस ज़ाहिर मैं करूँ या शुक्रिया
उसका करूँ,
वो जान मेरी ले गया,
चंद सांसें दे गया,
उल्फ़त भी करता वो अगर,
इज़हार मैं न कर सका,
वो मिट गया मेरे लिए,
पर यार ये न कह सका,
रोता रहा वो भी मगर,
पर आंशू बहा भी न सका,
अलफाज़ बाकी थे मगर,
इज़हार करने न दिया,
न कहा उसने भी कुछ,
और न मुझे कहने दिया,
न ज़िंदगी ही दी मुझे,
न मुझे मरने दिया,

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