Wednesday, August 13, 2014

तुम्हारी बात बाकी हों


ख़ुशी के चार दिन हों,

या समन्दर गहरा हो दुखों का,

फिसलती शाम का सूरज,

या घना कोहरा हों सुबह का,



मिले कोई हदों को लाँघकर,

या हदों की मुस्कराहट से,

कभी बरसात की बौछार से,

या धधकते किसी अंगार पे,



माथे की शिकन को छोड़ कर,

या फिर दो बूँद आशू के,

बलाओं के अँधेरे में,

या खुले आकाश से मिलकर,



हों खफा तुजसे,

या चाहतों का खुमार हों,

बदरी हों धूप को रोके,

या नदी हों सलबटे रोके,



बहारों की फुलबारी हों,

या रेगिस्तान के सूखे,

मिले कोई कभी तुजसे,

एक पल हों, या उम्र ही भर को,



मिलाना इस कदर खुद से,

के सारी रात बाकी हों,

किनारे हों सफर में भी

तुम्हारी बात बाकी हों,

No comments: