सब कहते हैं तुम पढलो,
बनकर कुछ दिखलाओ तुम,
नाम पिता का रोशन करना,
इस हद तक बढ़ जाओ तुम,
इक रात पडोसी वर्मा जी बोले, अफसर बन जाओ तुम,
दिल्ली मे है कोचिंग होती, वहाँ
दाखिला ले आओ तुम,
रुतवा है, शोहरत है, इसमे और
पैसे की कमी नहीं,
नौकर,
चाकार, गाड़ी, बंगला, कुछ तो अकल लगाओ तुम,
दोस्त यार सब हैं कहते, बैज्ञानिक
बन अमरीका जाओ,
नाशा मे भर्ती होकर के,
पैसा बहुत कमाओ तुम,
उड़ जाओ रॉकेट मे इक दिन, ब्रह्माण्ड
भ्रमड कर आओ तुम,
छोटे बच्चे पढ़े तुम्हें , करतब ऐसा कर जाओ तुम,
छोटू कहता है भैया, पकड़ के
बल्ला, क्रिकेटर बन जाओ तुम,
सचिन,
गांगुली, धोनी के जैसे फिर छक्के खूब लगाओ तुम,
ओलंपिक मे सोना लाकरके , नाम
बहुत कमाओगे तुम,
खेल कूदकर मेडल मिलते है, शायद
देशरत्न ले आओ तुम,
पैसा,
दौलत, शोहरत का क्या करना, ये कोई नहीं समझता क्यूँ?
मेरे किशोर सी व्याकुलता को,
फिर कोई नहीं समझता क्यूँ?
कुछ नाम कमांलूँ, दौलत या शोहरत,
बहुत से नामीं देखें हैं,
मैं कहता हूँ नेता बन जाऊँ, कुछ देश को देकर मैं जाऊँ,
सब रिश्ते मे कहते हैं,
ये काम कभी ना करना तुम,
बहुत कठिन है ये
रस्ता, इस पर कभी न चलना तुम,
जब सब कुछ है इस धंधे मे, क्यूँ ना नेता बन जाऊँ
मैं,
बिना पढ़े ही इस दुनिया मे क्यूँ ना नाम कमाऊँ मैं,
To be continued................
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