मैं आदि अंत
हूँ समय चक्र का, और मैं ही सूरज का पूरव,
मैं ही छुप जाता हूँ पश्चिम में, और खिल जाता हूँ
फूलों में,
मैं
ही रोशन करता दुनिया को , और मैं ही अंधकार फैलता हूँ,
मैं
ही अग्नि की पवित्रता , और मैं ही जल की सीतलता,
मुजसे ही जलता है दीपक, और मुजमे ही बुझ जाता
है,
मैं ही रोता हूँ बचपन मे, मैं ही योवन मे हसता,
एक अंकुर से बृक्ष बना मैं , और मैं ही हूँ मुरझा
जाता,
मैं ही पर्वत मैं ही सरिता, और रेत भरा मैदान हूँ
मैं,
मैं ही श्रेस्ठ हिमालया हूँ, और मैं ही गहराता सागर,
मैं ही विराट हिमखंड खड़ा, और मैं ही बहता हूँ झरनो
में,
मुजसे ही जीवित होता हर जन्तु, और मुजमे ही मर जाता
है,
न छोर कोई न अंत कोई, न मैं सीमाओं मे रहता,
जब हिलता है कोई पत्ता, तो मैं ही उस पत्ते मे
बसता,
मैं ही तेरे प्रश्न हूँ कौंतेय , और मैं ही प्रश्नों
के उत्तर,
हे पार्थ यही
सत्यता है, और परम ज्ञान इस माया का,
मेरी प्रभुता का साक्ष्य यही, मैं ही नायक इस दृष्टा
का,
पर प्रश्न और
भी उलझ गए, उत्तर पानें की जिज्ञाषा में,
अर्जुन का मन व्याकुल अब भी, शांत हृदय की अभिलाषा
में,