Friday, August 29, 2014

जवानी जोश मे है गर


अरे उन्माद मे गर हो, 
तो जाकर रोटियाँ बाटों,
जवानी जोश मे है गर, 
तो जाकर झुग्गियाँ झाँको,
तुम्हें राख़ तक नहीं, 
मिलेगी उनके चूल्हों मे,
अगर दम है तो जाकर के, 
सिहरती रात भर ताको,
अरे अफवाह मत फैलाओ, 
हमारा भाई-चारा है,
गरीबों का गरीबी मे, 
नहीं कोई सहारा है,
अगर जज़्बात जागे हों,
तो रास्ता नाप कर देखो,
तुम्हारे दिल मे गर्मी है, 
गरीबी का नाश कर फेकों,  

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Wednesday, August 27, 2014

तुम्हें सुनने की चाहत है


फकत चाहत की लेकर के, यहाँ महफिल आया हूँ,
सुनाने चंद लम्हों को, तुम्हारे दर पे आया हूँ,
बहुत है लोग महफिल मे, तुम्हें चुनने की आदत है,
हमें कहने की हशरत है, तुम्हें सुनने की चाहत है,

तुम्हारा शौक महफिल को, सजाना है मगर सुन ले,
जलाने तेरी महफिल को, तेरा एक खत मैं लाया हूँ,
तुम्हारी बेरुखी को हम कभी, उल्फ़त समझते थे,
भुलाने तेरी यादों को, तेरी महफिल मे लाया हूँ,

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चंद लकीरों से बनी


मुझसे बिछड़ के उनको, कोई गैर मिला होगा, 
मेरे शहर को छोड़, शहर कोई और मिला होगा, 
वादे, कसम, वफा महज़, ख़्वाब की बातें हैं, 
उनकी जफा के सदके सनम, कोई और मिला होगा

चंद लकीरों से बनी, तकदीर कहाँ लेकर जाएँ,
हम शीशे के घरौंदे को, किस-किस से बचाए,
यहाँ तो कब्र पर भी दिये, जला देते है लोग,
छुपाने हम अपने अँधेरों को, कहा लेकर जाए,

 
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Tuesday, August 26, 2014

करने मुझे दफन


दो फूल प्यार के, वो चड़ाने को आ गए,
करने मुझे दफन, वो बहाने से आ गए,
किस्मत भी गुल खिलाएगी,मुझको यकीन न था,
बारिश मे आज दामन, भिगा कर वो आ गए,

करके वो बंद मुट्ठी, मिट्टी है दे रहे,
रुश्वायियों का दाग, मिटाने वो आ गए,
करते जफा हम भी, तो मर जाते शौक से,
वो छुपते छुपाते आज, जमाने से आ गए,

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Sunday, August 24, 2014

न कहा उसने भी कुछ




न ज़िंदगी ही दी मुझे, न मुझे मरने दिया,
चुपचाप सींता रहा, जो जख्म उसने दिया,

है गम नहीं मुझको, मगर ये जनता हूँ मैं,
न जुस्तज़ू न इल्तजा, कुछ और देकर वो गया,
 
थी जानती मेरी नज़र, पर जुवां खामोश थी,
न अश्क ही वो दे सका, न दर्द ही देकर गया,

ना मुड़ सकूँ मैं फिर, ये वादा लेकर वो गया,
बर्बाद होकर भी मुझे, आबाद करके वो गया,

इन हवाओं से भी यही, फरियाद करके वो गया,
खामोश होकर भी मुझे, आवाज़ देकर वो गया,

ने शोर देकर वो गया, तन्हाइयों से था गिला,
मरके भी ज़िंदा हो गया, ऐसा हुनर वो दे गया,

अफसोस ज़ाहिर मैं करूँ या शुक्रिया उसका करूँ,
वो जान मेरी ले गया, चंद सांसें दे गया,

उल्फ़त भी करता वो अगर, इज़हार मैं न कर सका,
वो मिट गया मेरे लिए, पर यार ये न कह सका,

रोता रहा वो भी मगर, पर आंशू बहा भी न सका,
अलफाज़ बाकी थे मगर, इज़हार करने न दिया,

न कहा उसने भी कुछ, और न मुझे कहने दिया,
न ज़िंदगी ही दी मुझे, न मुझे मरने दिया,



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क्यूँ ढहती है हर मंजिल


क्यूँ  ढहती  है  हर  मंजिल  , 
क्यूँ  रेत  ही  बाकी  रहती  है ,
जलते  दीपक  की  अग्नि  की , 
क्यूँ  राख  ही  बाकी  रहती  है ,
हर  पंख  बुना  है  सपनों  से , 
हर  धागा  है  अरमानो  का 
पर  मेरी  ही  किस्मत  में  क्यूँ , 
हर  शीसा  है  बिखरा-बिखरा ,
जब  नीव  बनाने  जाता  हु , 
हर  पत्थर  हूँ  चुन   कर  रखता ,
अपने  ही  हाथों  से  मैं ,  
हर  परदे  को   हूँ  सींता ,
रंगों  की  बगिया  से  चुनकर , 
हर  गुल  को  दीवारों  पर  रंगता ,
पर  क्यूँ  हर  सुबहा   को  मैं ,
टूटी  दीवारों  पर  हँसता ,
मेरी  कसती  को  लहरों  की,  
आदत  तो  थी , 
मेरे  नाविक  को  तूफानों  की, 
आहट  तो  थी ,
पर  टूटी  नैय्या  की,  
हर  एक  लकड़ी , 
जब  हवा  मेरे  काबू  में  थी ,



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मेरे गाँव की वो बस्ती

मेरे  गाँव  की  वो  बस्ती, 
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही   जैसे  सहरों  की  भीड़,  
दिल  पर  कोई  घाव  है ,
है  याद  मुझे  वो  बचपन, 
नंगे  पैरों  की  बो  तड़पन,
वो  दिन  भर  भागना, 
सैतानी  करना  भी,  
तो  एक  राज   है, 
मेरे  घर  के  चबूतरे   पे, 
सुबहा  का  मंजर  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  शाम  को, 
 बुजुर्गो  की  भीड़,  
चबूतरे  पे  याद  है , 
नीम  के  पेंड  और  साबन के,  
झूले  याद  है ,
वो  पैग  बढाकर  आसमानों   को, 
 छुने की  चाहत  याद  है ,
है  याद  मुझे  सब  फिर  भी, 
पर  क्यूँ  मैं  वो  सब  भूल  गया ,
वैसे  ही  जैसे  हर  शख्श, 
प्यार  दिलों  से  भूल   गया ,
बारिश  के  आते  ही, 
 हम  सभी  घरों  में  मिलते  थे ,
सारी  दुनिया  की  बाते,  
और  प्यार  सभी  से  करते  थे ,
और  वो  रिमझिम  सावन,  
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  लोगो  के  आंसुओं  का,  
पानी  में  धुल  जाना  याद  है ,
जब  बारात  कोई,  
मेरे  गाँव  में  आती  थी ,
सारी  बस्ती  की  खुशियाँ,  
जैसे  दूनी  हो  जाती  थी ,
सारी-सारी रातों  में  ढोलक का,  
बजना मुझे  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे घर  से,  
बेटी  का  मइके  से,  
बिदा  हो  जाना  याद  है ,
है  याद  मुझे  दादी  की,  
बढती झुर्रियां , 
और  साथ  ही  उनके,  
प्यार  का  बढ जाना  याद  है ,
ठीक  वैसे  ही  जैसे, 
लोगो  के  दिलों  में,  
पड़ती  खाई  मुझे  याद  है ,
अब  नहीं  रही  है,  
मेरे  गाँव  में  बस्ती , 
पर  मुझे  सहरों में,  
भीड़  का  बढना  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  मेरे  गाँव  में, 
पक्की  ईटो  का,  
लगना  मुझे  याद  है ,
बन  गए  है  सभी  घर  पक्के , 
अब  चोर  नहीं  कोई,  
घुसता  है  मेरे  गाँव  में ,
वैसे  ही  जैसे किसी,  
खुसी  पर  लोगों  का  मेला,  
अब  नहीं  लगता  है  मेरे  गाँव  में ,
मेरे  गाँव  की  वो  बस्ती, 
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही   जैसे  सहरों  की  भीड़,  
दिल  पर  कोई  घाव है.


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चकोर हो तो






बरश-बरश के हमको न यूं भिगोया करो,

ऐ बादलों ये भी समझो, न चुपके रोया करो,



गुजरती शाम है, आवारा पतंगो का चलन,

चराग लौ मे, न पतंगो को यूं जलाया करो,



चकोर हो तो, माहताब की चाहत मे रहो,

न रातभर यूं तुम, चाँदनी बुलाया करो,



गुलाब बागों मे रहकर, अगर महफूज रहे,

ए गुलेबाँ न गुलाबो मे, कांटे उगाया करो,

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Saturday, August 23, 2014

आरजू भी क्या चीज़ है


आरजू  भी  क्या  चीज़  बनाई  है  , 
जामने  में  खुदाई  ने ,
के  हर  बूँद  ओश   की  सलवटों  पे,
  गिराई है मेरी  खुदाई  ने ,
हैं  भीड़  में  तन्हाईयाँ   अब ,
रुशवा  सी  है  परछाइयान  अब ,
मेरे  नज़र  की  ओट  में,
  फैली  हैं  क्यूँ   बीरानियाँ  अब ,
जलते  चरागों  की  जलन  में , 
जलना  ही  तय  है  जब  शमां  को ,
तो  आरजू  ये  भी  है  कैसे  , 
के  रोशन  करना  है  जहाँ  को ,
अब  रास्तों  की  घुटन  को , 
महसूश  करता  हूँ  कभी  जब ,
मैं  मंजिलो  की   चाह   को  , 
आहों  में  भरता  हूँ   कभी  जब ,
जब  चांदनी  से  चाँद  की,  
आस  करता  हूँ   कभी  जब ,
हर  बार  रोता  हूँ  मगर , 
हर  बार  जीता  हूँ  कभी  जब ,
बना  के  बांध  आँखों  में ,  
सिये  है  जख्म  गिरने  के ,
खड़ा  हो  जाऊंगा  सायद , 
सहारे  से  बुलंदी  के ,
नहीं  मालूम  है  टूटन  को , 
अगर  मैं  टूट  जाता  हूँ ,
हर  बार  पंखों  पे , 
मैं  मरहम  क्यूँ  लगता  हूँ ,
नहीं  है  होश  भी  अब  तो , 
नहीं  यादें  कुरेदी  हैं ,
नहीं  किस्मत  को  कोशा  है , 
नहीं  बाहें  समेटी  हैं ,
यही  है  फैसला  मेरा , 
मैं  किस्मत  खुद  बनाऊंगा ,
हवाओं  को  बदल  के  फिर , 
यहाँ  से  पुल  बनूँगा ,
चलूँगा रास्तों  पर  मैं, 
मैं  रास्ता  खुद  बनाऊंगा ,
खुदा  से  इक   बार  फिर  लड़के , 
नया  जहाँ  बनाऊंगा
 
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