इतनी गैरत भी क्या, जो सरमिंदा होना पड़े,
झुका के नज़रें बाज़ार मे, चलना पड़े,
हैसियत बनाने मे भी, बुनियादी खर्च है,
किस चीज़ की है जरूरत? जो ईमान बेचना पड़े,
सीडियाँ लगाकर आसमानो पे, चड़ना चाहते है,
ऐसी भी क्या जुरूरत जो गैरों के बल, उड़ना
पड़े,
सपने कामयाबी के, जिंदगी की मंज़िलें नहीं होती,
क्या ज़रूरत है? जो सपनें देखने के लिए सोना पड़े,
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