Saturday, August 16, 2014

जेहाद कहने वाले




गिरते है शाख से फूल भी, गुलाव दिखने बाले,

मरते हैं अक्सर गरीबी मे ही, गरीबों पर किताब लिखने बाले,

के बेबशी चाह कर भी मुकद्दर नहीं बदल सकती,

और बदलते भी है लोग, तो ख्वावों का भी हिसाब रखने वाले,



गुनाहों का ऐसा सिलसिला है, के थामे नहीं थमता,

हमें ही वेबफा कहने लगे, चाँद तारों का खिताब रखने वाले,

अरे अब तो सरम खाओ, खुदा के वास्ते,

इंसानियत के कत्ल को, जेहाद कहने वाले,


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3 comments:

Jyoti khare said...

बहुत सुन्दर और भावुक अभिव्यक्ति ---

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाऐं ----

Jyoti khare said...

aagrah hai mere blog main sammlit hon

ShrikantShekhar said...

धन्यबाद