Saturday, August 23, 2014

आरजू भी क्या चीज़ है


आरजू  भी  क्या  चीज़  बनाई  है  , 
जामने  में  खुदाई  ने ,
के  हर  बूँद  ओश   की  सलवटों  पे,
  गिराई है मेरी  खुदाई  ने ,
हैं  भीड़  में  तन्हाईयाँ   अब ,
रुशवा  सी  है  परछाइयान  अब ,
मेरे  नज़र  की  ओट  में,
  फैली  हैं  क्यूँ   बीरानियाँ  अब ,
जलते  चरागों  की  जलन  में , 
जलना  ही  तय  है  जब  शमां  को ,
तो  आरजू  ये  भी  है  कैसे  , 
के  रोशन  करना  है  जहाँ  को ,
अब  रास्तों  की  घुटन  को , 
महसूश  करता  हूँ  कभी  जब ,
मैं  मंजिलो  की   चाह   को  , 
आहों  में  भरता  हूँ   कभी  जब ,
जब  चांदनी  से  चाँद  की,  
आस  करता  हूँ   कभी  जब ,
हर  बार  रोता  हूँ  मगर , 
हर  बार  जीता  हूँ  कभी  जब ,
बना  के  बांध  आँखों  में ,  
सिये  है  जख्म  गिरने  के ,
खड़ा  हो  जाऊंगा  सायद , 
सहारे  से  बुलंदी  के ,
नहीं  मालूम  है  टूटन  को , 
अगर  मैं  टूट  जाता  हूँ ,
हर  बार  पंखों  पे , 
मैं  मरहम  क्यूँ  लगता  हूँ ,
नहीं  है  होश  भी  अब  तो , 
नहीं  यादें  कुरेदी  हैं ,
नहीं  किस्मत  को  कोशा  है , 
नहीं  बाहें  समेटी  हैं ,
यही  है  फैसला  मेरा , 
मैं  किस्मत  खुद  बनाऊंगा ,
हवाओं  को  बदल  के  फिर , 
यहाँ  से  पुल  बनूँगा ,
चलूँगा रास्तों  पर  मैं, 
मैं  रास्ता  खुद  बनाऊंगा ,
खुदा  से  इक   बार  फिर  लड़के , 
नया  जहाँ  बनाऊंगा
 
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