आरजू भी क्या चीज़ बनाई है ,
जामने में खुदाई ने ,
के हर बूँद ओश की सलवटों पे,
गिराई है मेरी खुदाई ने ,
हैं भीड़ में तन्हाईयाँ अब ,
रुशवा सी है परछाइयान अब ,
मेरे नज़र की ओट में,
फैली हैं क्यूँ बीरानियाँ अब ,
जलते चरागों की जलन में ,
जलना ही तय है जब शमां को ,
तो आरजू ये भी है कैसे ,
के रोशन करना है जहाँ को ,
अब रास्तों की घुटन को ,
महसूश करता हूँ कभी जब ,
मैं मंजिलो की चाह को ,
आहों में भरता हूँ कभी जब ,
जब चांदनी से चाँद की,
आस करता हूँ कभी जब ,
हर बार रोता हूँ मगर ,
हर बार जीता हूँ कभी जब ,
बना के बांध आँखों में ,
सिये है जख्म गिरने के ,
खड़ा हो जाऊंगा सायद ,
सहारे से बुलंदी के ,
नहीं मालूम है टूटन को ,
अगर मैं टूट जाता हूँ ,
हर बार पंखों पे ,
मैं मरहम क्यूँ लगता हूँ ,
नहीं है होश भी अब तो ,
नहीं यादें कुरेदी हैं ,
नहीं किस्मत को कोशा है ,
नहीं बाहें समेटी हैं ,
यही है फैसला मेरा ,
मैं किस्मत खुद बनाऊंगा ,
हवाओं को बदल के फिर ,
यहाँ से पुल बनूँगा ,
चलूँगा रास्तों पर मैं,
मैं रास्ता खुद बनाऊंगा ,
खुदा से इक बार फिर लड़के ,
नया जहाँ बनाऊंगा

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