सुना है तेरे चाहने वालों ने,
मकान बदल दिये,
वो तो रहगुज़ारी का,
इंतेजाम भी न कर सका,
और ना गवारा जमाने ने,
शहर के नाम बदल दिये,
जियारत मे बगावत का सिलशिला
एसा बड़ गया,
मुफ़्लिशी और मंसूबीयत ने,
इंसान बदल दिये,
खिलाफत मे ज़िंदगी की ये हश्र
भी हो गया,
मकबरा तो बही है पर मुर्दों
ने, कब्रस्तान बदल दिये,

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