Wednesday, August 6, 2014

ये जो हिसाब-ए-दर्दे-जिगर, आता नहीं समझ

ये जो हिसाब-ए-दर्दे-जिगर, आता नहीं समझ,
मुश्किल हैं राहें दस्त, के घर, आता नहीं नजर,

किसकी तलाश में भटक-कर, गर्दिश में आ गए,
बड़ी दूर चल चुके के शहर, आता नहीं नजर,

उनके शहर मे लोग मुझे, देखेंगे किस कदर,
लगता है डर बो आज मगर, आता नहीं नजर,

दीवानगी की रात भी, मैकश मे कट गयी,
दिन भी बचा तो मय के बिना, आता नहीं नजर,

पहले की बज्म में सफर के, अपने थे रहगुज़र,
खाली पड़ी महफिल का सबब, आता नहीं नजर,




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