Tuesday, September 23, 2014

क्या, सोये नहीं हो तुम


बड़ी उखड़ी नज़र है आज क्या, सोये नहीं हो तुम?
जवां है इश्क का मौसम, कहाँ खोये हुए हो तुम?

नज़र आता है के तबीयत ज़रा, नाज़ुक तुम्हारी है,
ये लगता है के सब-भर प्यार मे, रोये हुए हो तुम,

ये कमसिन सी जवानी को खुदा, रहमत जवां बख्शे,
ये मुमकिन हो के संगेदिल, कहीं पाये नहीं हो तुम,

गुलाबों के चमन मे तो, ख़लिश काँटों की है मुमकिन,
किसी की बेखुदी के ज़ख्म तो, खाये नहीं हो तुम?

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Friday, September 19, 2014

चिड़िया रैन बसेरा है


बस्ती हैं बंजारों की सब, चिड़िया रैन बसेरा है,
उठ-उठ गिरती सांश अधूरी, दो पल का ये डेरा है,
हम हैं तुम हो इस दुनियाँ में, संसार इसी से पूरा है,
प्रेमहि की है भाषा उत्तम, प्रेम बिना अँधियारा है,

तुम आए हो जीवन मे, हर ओर उजाला आया है,
सावन की रिमझिम हो तुम, तुम पर जीवन वारा है,
घुंगरू बज उठते हैं मन मे, प्रेम का तुम इकतारा हो,
भोला सा है प्रेम हमारा, तुम इस जीवन का तारा हो,

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इसी उम्मीद में जिन्दा हैं


इसी उम्मीद में जिन्दा हैं,के मर जाना है,

जिंदगी धूल पुडिया है, घुल जाना है,


हमने पीने को जो पीना कहा, साकी रूठा,

बिन पिए रुसवा भी होकर के, कहाँ जाना है,


अब तलक जब भी चले हम तो, तन्हा ही चले,

हमसे साथी बिछड़ गए, सफ़र का ताना है,


हम तो झोके है हवा के, कही ठहरते  नहीं,

आशियाने ने ही छोड़ा हमें, कहाँ ठिकाना है,


उसने भी पूंछा मेरा हाल, कुछ इस तरह से,

के जख्म दिल से भी गहरे हैं, दिल ने माना है,


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Tuesday, September 16, 2014

तुम राग प्रेम की सुरबाला,



तुम राग प्रेम की सुरबाला, 
मैं उन्मुक्त हृदय का मतवाला,
सुर सात रंग की सरगम तुम, 
मैं रिक्त सोम रस का प्याला,
तुम पुरवाई सावन अम्रत, 
मैं शुष्क जलासय की माला,
तुम हवन कुंड की पावन अग्नि, 
मैं शमन देह विश्मित ज्वाला,
जिह रंग भरूँ तिह खालीपन, 
जिह सैर करूँ बंजारापन,
तुम रचना शब्दों से बढकर, 
दैवीय कला का तुम दर्शन,
मैं नरतन का चित्र हताहत, 
तुम सृंगार श्रेष्ट का हो दर्पण,
मैं व्यंग योग्य मानुष निर्धन, 
है समृद्ध धरा तुम पर अर्पण,

Saturday, September 13, 2014

ये जो चौदवी का चाँद है,


नकाब में  न छुपाइए, ये जो चौदवी का चाँद है,
न हिसाब से छलकाइये, ये नशीली आँखों का जाम है,

ये जो पी रहे हैं बिना पिए, ये तुम्हारा ही अहसान है,
न बंद हो जाये मैकदे, ये तुम्हारी मर्जी का काम है,

है रात में बेखुद सभी तुम्हारा नाम है ले रहे
न कही बदनाम कर दे ये जो तुम्हारी जुल्फों की शाम है,

तुम्हारी हरकत-वेहरकतों का, नुमाइसी जो अंदाज़ है,
कहीं नीलाम हो भी न जाएँ, तुम्हारे आशिक तमाम है,

हमे है मौला की खाश बरकत, तुम्हारी महफ़िल में आम है,
जिन्हें मचलने की लौ लगी है, इन्हें तो जलने से काम है,

Thursday, September 11, 2014

तो क्या रोये जमाने मे


बिलखती आँख भर रोये, तो क्या रोये जमाने मे,
सज़ा काटी मुकद्दर की, तो क्या पाये जमाने मे?
सितमगर हो अगर साकी, मज़ा फिर क्या है पीने मे,
अगर डूबे जो आँखों मे, तो क्या डूबे जमाने मे?

ख़लिश जितनी भी हो मरहम, दवा सब छोड़ देते है,
निबालों के जो भूखे हैं, शर्मो-हया सब छोड़ देते है,
इन्हें इज्ज़त बचाने की, जरूरत भी नहीं पड़ती,
समंदर मे जो तैरे हो, वो शाहिल छोड़ देते हैं,

वज़ा फर्माइए, शीशों के महल मे जो बैठे हैं,
उतरकर आइये सड़कों पे, जमाने के थपेड़ो मे,
हवा ऊपर की लगती है, तो ठंडक लग ही जाती है,
यहा तो लू भी लगती है, तो पशीनें शूख जाते हैं,

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जब प्यार कोई भर देता है


हर बार खिले होंठो पर जबमुस्कान हृदय भर देता है,
मन भावन इस बृंदावन मेजब प्यार कोई भर देता है,
सारी पीड़ा ओझल हो जाती है,जब थपकी भर कोई देता है,
चुप रहकर भी जो मुझ मेदम भरकर सारी पीड़ा हर लेता है,

बूंदों से ही प्यास बुझे तो मैं क्यूँसागर तट तक उड़ जाऊँ,
इस नयन दृष्टि के परे फिरूँ क्यूँइन नयनो को मैं भरमाऊँ,
बूंद जोड़ एक-एक आंशू की मेरेमुझ मे जान फूँक देता है कोई,
कंधे पर सर रखकर जब मुझमेलड़ने की ताकत भर देता है,

जन्म सात चलने का बादा लेकरसाथ मेरे चलता जाता है,
जब काँटा चुभ जाये तोअश्रु धार बादल गहरा सा जाता है,
मुश्किल आंशा हो जाती हैजब हांथ थाम रास्ता दिखलाता है,
कहता है मुझसे चलते जाओऔर साथ मेरे चलता जाता है,

निस्वार्थ भाव है प्रेम सदा जिसकाऔर निर्मल जल सी श्रद्धा है,
मेरे पिछले जन्मो का वरदान कोईमुझ पर कोई अनुकंपा है,
हर जन्म सिद्ध हो जाए जबऐसा जीवन साझी बन जाता है,
प्रभु कृपा का पात्र बने कोई जबऐसा साथी जीवन बन जाता है,

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Monday, September 8, 2014

मानुष जीवन संघर्ष भरा


पीड़ा संग बंधन हर्ष भरा,
मानुष जीवन संघर्ष भरा,

हर ओर मिले बगिया महकी,
हर ओर जले दीपक जैसा,

प्रभुता पर दुबिधा तब तक,
जब तक ब्यथा रहे मस्तक,

पगडंडी पथ पर अचल खड़ी,
हैं पथिक राह चुनते जाते,

कोई घोर संकटों पर से गुजरे,
कहि हर्ष भरा जीवन उजड़े,

कुछ हाथों की रेखाएँ चुन लेते हैं,
कुछ त्याग भाग्य पर करते जाते,

कुछ निछाबर कर देते हैं जीवन,
कुछ जीव निछाबर होते जाते,

माथे पर घेरों का अर्थ तो है,
संभबत: वृत्त आरंभ पे है,

क्या कथा मेरे प्रारब्ध मे है,
क्या रचा मेरे प्रारब्ध मे है,

पीड़ा संग बंधन हर्ष भरा,
मानुष जीवन संघर्ष भरा,



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Friday, August 29, 2014

जवानी जोश मे है गर


अरे उन्माद मे गर हो, 
तो जाकर रोटियाँ बाटों,
जवानी जोश मे है गर, 
तो जाकर झुग्गियाँ झाँको,
तुम्हें राख़ तक नहीं, 
मिलेगी उनके चूल्हों मे,
अगर दम है तो जाकर के, 
सिहरती रात भर ताको,
अरे अफवाह मत फैलाओ, 
हमारा भाई-चारा है,
गरीबों का गरीबी मे, 
नहीं कोई सहारा है,
अगर जज़्बात जागे हों,
तो रास्ता नाप कर देखो,
तुम्हारे दिल मे गर्मी है, 
गरीबी का नाश कर फेकों,  

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Wednesday, August 27, 2014

तुम्हें सुनने की चाहत है


फकत चाहत की लेकर के, यहाँ महफिल आया हूँ,
सुनाने चंद लम्हों को, तुम्हारे दर पे आया हूँ,
बहुत है लोग महफिल मे, तुम्हें चुनने की आदत है,
हमें कहने की हशरत है, तुम्हें सुनने की चाहत है,

तुम्हारा शौक महफिल को, सजाना है मगर सुन ले,
जलाने तेरी महफिल को, तेरा एक खत मैं लाया हूँ,
तुम्हारी बेरुखी को हम कभी, उल्फ़त समझते थे,
भुलाने तेरी यादों को, तेरी महफिल मे लाया हूँ,

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चंद लकीरों से बनी


मुझसे बिछड़ के उनको, कोई गैर मिला होगा, 
मेरे शहर को छोड़, शहर कोई और मिला होगा, 
वादे, कसम, वफा महज़, ख़्वाब की बातें हैं, 
उनकी जफा के सदके सनम, कोई और मिला होगा

चंद लकीरों से बनी, तकदीर कहाँ लेकर जाएँ,
हम शीशे के घरौंदे को, किस-किस से बचाए,
यहाँ तो कब्र पर भी दिये, जला देते है लोग,
छुपाने हम अपने अँधेरों को, कहा लेकर जाए,

 
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Tuesday, August 26, 2014

करने मुझे दफन


दो फूल प्यार के, वो चड़ाने को आ गए,
करने मुझे दफन, वो बहाने से आ गए,
किस्मत भी गुल खिलाएगी,मुझको यकीन न था,
बारिश मे आज दामन, भिगा कर वो आ गए,

करके वो बंद मुट्ठी, मिट्टी है दे रहे,
रुश्वायियों का दाग, मिटाने वो आ गए,
करते जफा हम भी, तो मर जाते शौक से,
वो छुपते छुपाते आज, जमाने से आ गए,

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Sunday, August 24, 2014

न कहा उसने भी कुछ




न ज़िंदगी ही दी मुझे, न मुझे मरने दिया,
चुपचाप सींता रहा, जो जख्म उसने दिया,

है गम नहीं मुझको, मगर ये जनता हूँ मैं,
न जुस्तज़ू न इल्तजा, कुछ और देकर वो गया,
 
थी जानती मेरी नज़र, पर जुवां खामोश थी,
न अश्क ही वो दे सका, न दर्द ही देकर गया,

ना मुड़ सकूँ मैं फिर, ये वादा लेकर वो गया,
बर्बाद होकर भी मुझे, आबाद करके वो गया,

इन हवाओं से भी यही, फरियाद करके वो गया,
खामोश होकर भी मुझे, आवाज़ देकर वो गया,

ने शोर देकर वो गया, तन्हाइयों से था गिला,
मरके भी ज़िंदा हो गया, ऐसा हुनर वो दे गया,

अफसोस ज़ाहिर मैं करूँ या शुक्रिया उसका करूँ,
वो जान मेरी ले गया, चंद सांसें दे गया,

उल्फ़त भी करता वो अगर, इज़हार मैं न कर सका,
वो मिट गया मेरे लिए, पर यार ये न कह सका,

रोता रहा वो भी मगर, पर आंशू बहा भी न सका,
अलफाज़ बाकी थे मगर, इज़हार करने न दिया,

न कहा उसने भी कुछ, और न मुझे कहने दिया,
न ज़िंदगी ही दी मुझे, न मुझे मरने दिया,



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क्यूँ ढहती है हर मंजिल


क्यूँ  ढहती  है  हर  मंजिल  , 
क्यूँ  रेत  ही  बाकी  रहती  है ,
जलते  दीपक  की  अग्नि  की , 
क्यूँ  राख  ही  बाकी  रहती  है ,
हर  पंख  बुना  है  सपनों  से , 
हर  धागा  है  अरमानो  का 
पर  मेरी  ही  किस्मत  में  क्यूँ , 
हर  शीसा  है  बिखरा-बिखरा ,
जब  नीव  बनाने  जाता  हु , 
हर  पत्थर  हूँ  चुन   कर  रखता ,
अपने  ही  हाथों  से  मैं ,  
हर  परदे  को   हूँ  सींता ,
रंगों  की  बगिया  से  चुनकर , 
हर  गुल  को  दीवारों  पर  रंगता ,
पर  क्यूँ  हर  सुबहा   को  मैं ,
टूटी  दीवारों  पर  हँसता ,
मेरी  कसती  को  लहरों  की,  
आदत  तो  थी , 
मेरे  नाविक  को  तूफानों  की, 
आहट  तो  थी ,
पर  टूटी  नैय्या  की,  
हर  एक  लकड़ी , 
जब  हवा  मेरे  काबू  में  थी ,



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मेरे गाँव की वो बस्ती

मेरे  गाँव  की  वो  बस्ती, 
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही   जैसे  सहरों  की  भीड़,  
दिल  पर  कोई  घाव  है ,
है  याद  मुझे  वो  बचपन, 
नंगे  पैरों  की  बो  तड़पन,
वो  दिन  भर  भागना, 
सैतानी  करना  भी,  
तो  एक  राज   है, 
मेरे  घर  के  चबूतरे   पे, 
सुबहा  का  मंजर  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  शाम  को, 
 बुजुर्गो  की  भीड़,  
चबूतरे  पे  याद  है , 
नीम  के  पेंड  और  साबन के,  
झूले  याद  है ,
वो  पैग  बढाकर  आसमानों   को, 
 छुने की  चाहत  याद  है ,
है  याद  मुझे  सब  फिर  भी, 
पर  क्यूँ  मैं  वो  सब  भूल  गया ,
वैसे  ही  जैसे  हर  शख्श, 
प्यार  दिलों  से  भूल   गया ,
बारिश  के  आते  ही, 
 हम  सभी  घरों  में  मिलते  थे ,
सारी  दुनिया  की  बाते,  
और  प्यार  सभी  से  करते  थे ,
और  वो  रिमझिम  सावन,  
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  लोगो  के  आंसुओं  का,  
पानी  में  धुल  जाना  याद  है ,
जब  बारात  कोई,  
मेरे  गाँव  में  आती  थी ,
सारी  बस्ती  की  खुशियाँ,  
जैसे  दूनी  हो  जाती  थी ,
सारी-सारी रातों  में  ढोलक का,  
बजना मुझे  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे घर  से,  
बेटी  का  मइके  से,  
बिदा  हो  जाना  याद  है ,
है  याद  मुझे  दादी  की,  
बढती झुर्रियां , 
और  साथ  ही  उनके,  
प्यार  का  बढ जाना  याद  है ,
ठीक  वैसे  ही  जैसे, 
लोगो  के  दिलों  में,  
पड़ती  खाई  मुझे  याद  है ,
अब  नहीं  रही  है,  
मेरे  गाँव  में  बस्ती , 
पर  मुझे  सहरों में,  
भीड़  का  बढना  याद  है ,
वैसे  ही  जैसे  मेरे  गाँव  में, 
पक्की  ईटो  का,  
लगना  मुझे  याद  है ,
बन  गए  है  सभी  घर  पक्के , 
अब  चोर  नहीं  कोई,  
घुसता  है  मेरे  गाँव  में ,
वैसे  ही  जैसे किसी,  
खुसी  पर  लोगों  का  मेला,  
अब  नहीं  लगता  है  मेरे  गाँव  में ,
मेरे  गाँव  की  वो  बस्ती, 
आज  भी  मुझे  याद  है ,
वैसे  ही   जैसे  सहरों  की  भीड़,  
दिल  पर  कोई  घाव है.


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चकोर हो तो






बरश-बरश के हमको न यूं भिगोया करो,

ऐ बादलों ये भी समझो, न चुपके रोया करो,



गुजरती शाम है, आवारा पतंगो का चलन,

चराग लौ मे, न पतंगो को यूं जलाया करो,



चकोर हो तो, माहताब की चाहत मे रहो,

न रातभर यूं तुम, चाँदनी बुलाया करो,



गुलाब बागों मे रहकर, अगर महफूज रहे,

ए गुलेबाँ न गुलाबो मे, कांटे उगाया करो,

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