घर
लौटा हूँ या,
खो गया हूँ घर ही में,
खो गया हूँ घर ही में,
कुछ
याद नहीं कहाँ गया था मैं,
निकला
था खाश लिए,
कुछ करने की चाहत से मैं,
कुछ करने की चाहत से मैं,
ये
क्या कर आया मैं,
जिस पर मेरा अधिकार नहीं,
जिस पर मेरा अधिकार नहीं,
मैं
अन्धकार ले आया हूँ,
या प्रकाश भूल आया जग में,
या प्रकाश भूल आया जग में,
तुम
सब ने क्यों भेद बनाया,
प्रश्न बनाया इस जग में,
प्रश्न बनाया इस जग में,
माटी
के पुतलों पर क्यूँ,
व्यंग उड़ाया तुम सब ने,
व्यंग उड़ाया तुम सब ने,
इक
राह पकड़ पगडण्डी सी,
उठते गिरते गलियारों से,
उठते गिरते गलियारों से,
मैं
निकल गया था घर से,
अब घर मैं क्यूँ आया हूँ,
अब घर मैं क्यूँ आया हूँ,
मैं
जग से लौटा हूँ या,
मैं खो गया हूँ इस जग में,
मैं खो गया हूँ इस जग में,
2 comments:
यही तो माया है ... घर में हो कर भी जग में ...
आपकी कीमती प्रतिक्रिया के लिए धन्यबाद
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