Sunday, August 10, 2014

खो गया हूँ मैं

घर लौटा हूँ या, 
खो गया हूँ घर ही में,
कुछ याद नहीं कहाँ गया था मैं,
निकला था खाश लिए,  
कुछ करने की चाहत से मैं,
ये क्या कर आया मैं
जिस पर मेरा अधिकार नहीं,
मैं अन्धकार ले आया हूँ,  
या प्रकाश भूल आया जग में,

तुम सब ने क्यों भेद बनाया
प्रश्न बनाया इस जग में,
माटी के पुतलों पर क्यूँ,  
व्यंग उड़ाया तुम सब ने,
इक राह पकड़ पगडण्डी सी
उठते गिरते गलियारों से,
मैं निकल गया था घर से,
 अब घर मैं क्यूँ आया हूँ,
मैं जग से लौटा हूँ या, 
मैं खो गया हूँ इस जग में,


2 comments:

दिगम्बर नासवा said...

यही तो माया है ... घर में हो कर भी जग में ...

ShrikantShekhar said...

आपकी कीमती प्रतिक्रिया के लिए धन्यबाद