बिलखती आँख भर रोये,
तो क्या रोये जमाने मे,
सज़ा काटी मुकद्दर की,
तो क्या पाये जमाने मे?
सितमगर हो अगर साकी,
मज़ा फिर क्या है पीने मे,
अगर डूबे जो आँखों मे,
तो क्या डूबे जमाने मे?
ख़लिश जितनी भी हो मरहम,
दवा सब छोड़ देते है,
निबालों के जो भूखे हैं,
शर्मो-हया सब छोड़ देते है,
इन्हें इज्ज़त बचाने की,
जरूरत भी नहीं पड़ती,
समंदर मे जो तैरे हो,
वो शाहिल छोड़ देते हैं,
वज़ा फर्माइए,
शीशों के महल मे जो बैठे हैं,
उतरकर आइये सड़कों पे,
जमाने के थपेड़ो मे,
हवा ऊपर की लगती है,
तो ठंडक लग ही जाती है,
यहा तो लू भी लगती है,
तो पशीनें शूख जाते हैं,if you like the poem, please left a comment !

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