तुम राग प्रेम की सुरबाला,
मैं उन्मुक्त हृदय का मतवाला,
सुर सात रंग की सरगम तुम,
मैं रिक्त सोम रस का प्याला,
तुम पुरवाई सावन अम्रत,
मैं शुष्क जलासय की माला,
तुम हवन कुंड की पावन अग्नि,
मैं शमन देह विश्मित ज्वाला,
जिह रंग भरूँ तिह खालीपन,
जिह सैर करूँ बंजारापन,
तुम रचना शब्दों से बढकर,
दैवीय कला का तुम दर्शन,
मैं नरतन का चित्र हताहत,
तुम सृंगार श्रेष्ट का हो दर्पण,
मैं व्यंग योग्य मानुष निर्धन,
है समृद्ध धरा तुम पर अर्पण,

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