पीड़ा संग बंधन हर्ष भरा,
मानुष जीवन संघर्ष भरा,
हर ओर मिले बगिया महकी,
हर ओर जले दीपक जैसा,
प्रभुता पर दुबिधा तब तक,
जब तक ब्यथा रहे मस्तक,
पगडंडी पथ पर अचल खड़ी,
हैं पथिक राह चुनते जाते,
कोई घोर संकटों पर से गुजरे,
कहि हर्ष भरा जीवन उजड़े,
कुछ हाथों की रेखाएँ चुन लेते हैं,
कुछ त्याग भाग्य पर करते जाते,
कुछ निछाबर कर देते हैं जीवन,
कुछ जीव निछाबर होते जाते,
माथे पर घेरों का अर्थ तो है,
संभबत:
वृत्त आरंभ पे है,
क्या कथा
मेरे प्रारब्ध मे है,
क्या रचा मेरे प्रारब्ध मे है,
पीड़ा संग बंधन हर्ष भरा,
मानुष जीवन संघर्ष भरा,
if you like the poem, please left a comment !

No comments:
Post a Comment