इसी उम्मीद में जिन्दा हैं,के मर जाना है,
जिंदगी धूल पुडिया है, घुल जाना है,
हमने पीने को जो पीना कहा, साकी रूठा,
बिन पिए रुसवा भी होकर के, कहाँ जाना है,
अब तलक जब भी चले हम तो, तन्हा ही चले,
हमसे साथी बिछड़ गए, सफ़र का ताना है,
हम तो झोके है हवा के, कही ठहरते नहीं,
आशियाने ने ही छोड़ा हमें, कहाँ ठिकाना है,
उसने भी पूंछा मेरा हाल, कुछ इस तरह से,
के जख्म दिल से भी गहरे हैं, दिल ने माना है,
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