के झूमती है महफिल मे, रंजों गम की महक,
आदमी हर तरफ मुस्कुरा रहा, के कोई गम नहीं है,
चेहरों पर हंशी है,
और होंठों पे मुस्कुराहट है,
के हर तरफ हैं संघे दिल,
के कोई गम नहीं है,
जमीन पर से उठे हैं ये सय, ये दिखने नहीं देते,
जमीन पर रौंदते कीड़े,
के कोई गम नहीं है,
के बड़े मदहोश होते है,
ये मयकशी मे,
खुद की पहचान भुला दी है,
के कोई गम नहीं है
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