Wednesday, July 30, 2014

सरहदें

इन बंजरों सी  राह मे, कोई शूबा नहीं बचा,
जलती थी जिनमें आग, वो चूल्हा नहीं बचा,

नफ़रतों की आग मे, ज़र्रे भी जल गए,
जो रह गए निशान तो, मलवा नहीं बचा,

वीरान हो गईं है, गावों की मजलिशें,
सरहद की बंदिशों में , अरमा नहीं बचा,

बड़े वेदर्द मंसूबे सियशतदारों के रहे होंगे,
जहन मे किसी के, चीखो का सदमा नहीं बचा,

धब्बे भी सरजमीं के, मुद्दों मे जल गए,
नासूर से दिलों को, मरहम नहीं मिला,

बेखौफ हैं सियाशी, हौसलों के दौर,
दर साल दर गुजर कर भी, चैन ना मिला,


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