Thursday, July 31, 2014

मेरा महबूब

उनके हाथों की मेहंदी का रंग है, मुजपे चड़के उतरता नहीं है,
होश मे मैं नहीं हूँ जमाना, मुजकों मैकश की आदत नहीं है,

बैठ जाऊँ जो साये मे इक पल, छोड़कर उलझनों के सफर को,
काली ज़ुल्फों की मदहोश रातें, नींद जाकर के आती नहीं है,

तैरना जानता मै नहीं हूँ, मुजमे लहरों की जुर्रत नहीं है,
झील सी नीली आँखों की लत है, डूबकर मैं उबरता नहीं हूँ,

उम्दा कारीगरी है खुदा की, कितनी फुर्सत से उनको तराशा,
एक पल भी वो ओझल जो हो जाते हैं, मेरी तबीयत सुधरती नहीं है,

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