Chapter -1 “अथाह सागर”
कंकड़ों के गिरने से, पानी मे उठती तरंगे और देव का उन्हें एक टक ताकते रहना, जब तक की एक-एक तरंग, फिर से उसी तालाब के पानी मे विलीन ना हो जाए, पानी के शांत होते ही फिर से एक और कंकड़/
देव किसी गहरी सोच मे तालाब के किनारे पड़ी बेंच पर बैठा हुआ, पानी को एक टक निहार रहा था, दिसम्बर की कड्कड़ाती ठंड मे खिली हल्की धूप की गर्माहट जैसे उसे थोड़ा सकून दे रही थी, आस पास सिर्फ घने पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और पंछियों की चहचहाअट का शोर भी, देव के अंदर की शांति को भंग नहीं कर पा रहे थे, हर तरफ हरी घास की फैली चादर ने इस दृश्य को और भी मनोरम बना दिया/
एक के बाद एक कंकड़ तलाब की शांति को भंग कर रहे थे और तालाब फिर से कौतूहल करता हुआ खुद मे फैली हुई विशाल तरलता को संकुचित कर लेता, देव कंकड़ फेकता और फिर मन ही मन संतुष्टि भरी आह भरते हुये पानी को निहारता, जैसे उसे पानी नहीं बल्कि उसके अंदर चल रहे दृश्य एक एक कर उसकी आंखो के सामने आ जाते हों/
इतने मे इस अचल शांति को चीरते हुये, मंद ध्वनि से तीब्रता को ग्रहण करती पायल की झंकार ने इस दृश्य को और भी मनोहर बना दिया, देव ने अपने कंधे पर किसी के हांथ को महसूश किया, देव ने अपने कंधे पर रखे हुये हांथ को अपने हांथ से ढ़क लिया और पीछे मुड़ते हुये एक मंद मुस्कान से जैसे उस महिला का स्वागत किया/
देव ने इशारा करते हुए उसे बैठने को बोला, चेहरे पर देवियों सी आभा लिए वह मोहिनी स्त्री देव के पास बैठ गयी और देव के कंधे पर अपने सिर रख दिया, और फिर दोनों एक एक करके तालाब के पानी मे कंकड़ फेकने लगे/
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